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ICSE Class 10 Hindi (Sahitya Sagar) • Chapter Notes
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चलना हमारा काम है (Chalna Hamara Kaam Hai)

chalna hamara kaam hai path
पाठ परिचय

कवि: शिवमंगल सिंह 'सुमन'
कविता का स्वर: प्रेरणादायक और आशावादी
सारांश: 'चलना हमारा काम है' कविता निरंतर कर्म करने और जीवन के मार्ग पर आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा देती है। कवि का मानना है कि जीवन एक यात्रा है और हम सभी मुसाफिर (राही) हैं। इस मार्ग में सुख-दुख, आशा-निराशा और सफलता-असफलताएँ स्वाभाविक रूप से आती हैं, लेकिन मनुष्य को कभी रुकना नहीं चाहिए। जब तक लक्ष्य (मंज़िल) न मिल जाए, तब तक विश्राम करना उचित नहीं है। जो रुक जाते हैं, वे पिछड़ जाते हैं, और जो निरंतर चलते रहते हैं, वे अंततः सफलता प्राप्त करते हैं।

पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या

पद्यांश 1: निरंतर चलने की प्रेरणा

गति प्रबल पैरों में भरी, फिर क्यों रहूँ दर-दर खड़ा?
जब आज मेरे सामने है रास्ता इतना पड़ा।
जब तक न मंज़िल पा सकूँ, तब तक मुझे न विराम है,
चलना हमारा काम है।

शब्दार्थ: प्रबल = बहुत तेज़/मज़बूत; दर-दर = जगह-जगह; विराम = विश्राम/रुकना; मंज़िल = लक्ष्य।

प्रसंग: कवि ने इस पद्यांश में यह स्पष्ट किया है कि जब हमारे अंदर क्षमता है, तो हमें रुकना नहीं चाहिए और निरंतर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ना चाहिए।

भावार्थ: कवि कहते हैं कि जब ईश्वर ने मेरे पैरों में इतनी अपार शक्ति और तेज़ गति भर दी है, तो मैं फिर जगह-जगह (दर-दर) रुक कर समय क्यों बर्बाद करूँ? मेरे सामने अभी जीवन का इतना लंबा और विस्तृत रास्ता पड़ा है जिसे मुझे तय करना है। कवि स्वयं से यह संकल्प लेते हैं कि जब तक मैं अपनी मंज़िल (लक्ष्य) को प्राप्त न कर लूँ, तब तक मुझे रास्ते में कहीं भी विश्राम नहीं करना है। एक राही के रूप में निरंतर चलते रहना और कर्म करते रहना ही हमारा एकमात्र कर्तव्य और काम है।

पद्यांश 2: सुख-दुख में समानता

जीवन अपूर्ण लिए हुए, पाता कभी, खोता कभी,
आशा-निराशा से घिरा, हँसता कभी, रोता कभी।
गति-मति न हो अवरुद्ध, इसका ध्यान आठों याम है,
चलना हमारा काम है।

शब्दार्थ: अपूर्ण = अधूरा; अवरुद्ध = रुकना/बाधा आना; मति = बुद्धि; आठों याम = चौबीसों घंटे (हर समय)।

प्रसंग: इस पद्यांश में कवि जीवन की वास्तविकता (सुख-दुख के चक्र) को बताते हुए निरंतर आगे बढ़ने का संदेश दे रहे हैं।

भावार्थ: कवि कहते हैं कि मनुष्य का जीवन कभी पूरी तरह पूर्ण नहीं होता; वह हमेशा अधूरा (अपूर्ण) ही रहता है। इस जीवन यात्रा में मनुष्य कभी कुछ प्राप्त करता है (पाता है), तो कभी कुछ खो देता है। वह कभी आशाओं से भर जाता है, तो कभी निराशा उसे घेर लेती है; वह कभी खुशी से हँसता है और कभी दुखों के कारण रोता भी है। यह सब जीवन का स्वाभाविक हिस्सा है। लेकिन इन सबके बीच मनुष्य को आठों याम (हर समय) केवल इसी बात का ध्यान रखना चाहिए कि उसकी चलने की गति और उसकी बुद्धि (मति) किसी भी परिस्थिति में रुकनी (अवरुद्ध) नहीं चाहिए। परिस्थितियाँ चाहे जो भी हों, हमें निरंतर चलते रहना चाहिए।

पद्यांश 3: भाग्य को दोष न देना

इस विशद विश्व-प्रवाह में, किसको नहीं बहना पड़ा?
सुख-दुख हमारी ही तरह, किसको नहीं सहना पड़ा?
फिर व्यर्थ क्यों कहता फिरूँ, मुझ पर विधाता वाम है,
चलना हमारा काम है।

शब्दार्थ: विशद = विशाल/बड़ा; विश्व-प्रवाह = संसार की धारा; विधाता = ईश्वर/भाग्य; वाम = प्रतिकूल/नाराज़।

प्रसंग: कवि कहते हैं कि संघर्ष और परेशानियाँ हर व्यक्ति के जीवन में हैं, इसलिए हमें अपने भाग्य या ईश्वर को दोष नहीं देना चाहिए।

भावार्थ: कवि प्रश्न करते हैं कि इस विशाल संसार की धारा (विश्व-प्रवाह) में ऐसा कौन व्यक्ति है जिसे संघर्षों का सामना नहीं करना पड़ा हो? ऐसा कौन है जिसे हमारी तरह सुख और दुख नहीं सहने पड़े हों? अर्थात्, संसार में हर व्यक्ति को सुख-दुख और संघर्ष का सामना करना ही पड़ता है। जब यह स्थिति सबके लिए समान है, तो फिर मैं व्यर्थ में लोगों से यह शिकायत क्यों करता फिरूँ कि ईश्वर (विधाता) मुझसे नाराज़ (वाम) है या मेरा भाग्य ही खराब है? जीवन की इन कठिनाइयों को स्वीकार करते हुए हमें यह मानना चाहिए कि बिना रुके चलते रहना ही हमारा काम है।

पद्यांश 4: असफलता से न घबराना

साथ में चलते रहे, कुछ बीच ही से फिर गए,
पर गति न जीवन की रुकी, जो गिर गए, सो गिर गए।
रहता सदा आगे उसी की, सफलता अभिराम है,
चलना हमारा काम है।

शब्दार्थ: फिर गए = लौट गए/साथ छोड़ दिया; अभिराम = सुंदर/आकर्षक।

प्रसंग: कवि बताते हैं कि जीवन के मार्ग में कई लोग साथ छोड़ देते हैं, लेकिन हमें उनकी परवाह किए बिना निरंतर आगे बढ़ना चाहिए।

भावार्थ: कवि कहते हैं कि इस जीवन रूपी यात्रा में कई लोग हमारे साथ चलना शुरू करते हैं, लेकिन संघर्ष और कठिनाइयों को देखकर कुछ लोग बीच रास्ते से ही हार मानकर लौट (फिर) जाते हैं। जो लोग हार मानकर गिर जाते हैं (अर्थात् संघर्ष छोड़ देते हैं), वे वहीं रह जाते हैं। लेकिन उनके रुक जाने या साथ छोड़ देने से जीवन की गति कभी नहीं रुकती; समय और जीवन निरंतर आगे बढ़ता रहता है। सुंदर और आकर्षक (अभिराम) सफलता हमेशा उसी व्यक्ति के कदम चूमती है जो हार न मानकर सदा आगे बढ़ता रहता है। इसलिए हमारा काम केवल चलते रहना है।

chalna hamara kaam hai success

परीक्षा उपयोगी महत्वपूर्ण प्रश्न (PYQs)

प्रश्न 1 कवि ने जीवन को 'अपूर्ण' क्यों कहा है?
उत्तर: कवि ने जीवन को अपूर्ण इसलिए कहा है क्योंकि मनुष्य की इच्छाएँ कभी खत्म नहीं होतीं। जीवन में हमेशा कुछ न कुछ पाने की चाहत बनी रहती है। कभी हम कुछ पा लेते हैं और कभी कुछ खो देते हैं। सुख-दुख और सफलता-असफलता का यह चक्र हमेशा चलता रहता है। इसलिए जीवन को अपूर्ण कहा गया है।
प्रश्न 2 'फिर व्यर्थ क्यों कहता फिरूँ, मुझ पर विधाता वाम है' - इस पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: इस पंक्ति का आशय यह है कि जब संघर्ष, दुख और परेशानियाँ संसार के हर व्यक्ति के जीवन का हिस्सा हैं और कोई भी इनसे अछूता नहीं है, तो फिर मुझे अपनी छोटी-मोटी असफलताओं और कष्टों के लिए ईश्वर (विधाता) को दोष नहीं देना चाहिए। मुझे यह नहीं कहना चाहिए कि भगवान मेरे खिलाफ (वाम) है। बल्कि मुझे संघर्षों का सामना करते हुए आगे बढ़ना चाहिए।
प्रश्न 3 कवि के अनुसार 'सफलता' किसे प्राप्त होती है?
उत्तर: कवि के अनुसार सफलता केवल उसी व्यक्ति को प्राप्त होती है जो मार्ग में आने वाली बाधाओं और असफलताओं से निराश होकर बीच रास्ते में रुकता नहीं है। जो लोग कठिनाइयों में भी अपनी गति और बुद्धि (मति) को रुकने नहीं देते और निरंतर अपने लक्ष्य की ओर चलते रहते हैं, वे ही अंत में आकर्षक सफलता प्राप्त करते हैं।